दशकों पहले कोर्ट के आदेश से पूरी हुई बिक्री को सिर्फ रिफंड देकर नहीं किया जा सकता रद्द, सुप्रीम कोर्ट
NTN REPORT नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति बिक्री से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि बिक्री के समझौते के तहत स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का आदेश लागू हो चुका है, बिक्री विलेख न्यायालय के माध्यम से निष्पादित हो चुका है और खरीदार को संपत्ति का कब्जा भी मिल चुका है, तो कई दशक बाद केवल अधिक रकम का रिफंड देकर उस पूरी हो चुकी बिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी Sobaran Singh (Dead) Through Lrs. Versus Gordhan Singh (Dead) Thr. Lrs. मामले में की। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के वर्ष 1979 के फैसले को बहाल करते हुए खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाया।
1975 में हुआ था बिक्री का समझौता
मामला आगरा के पास करीब पांच बीघा कृषि भूमि से जुड़ा है। 16 जून 1975 को जमीन की बिक्री के लिए पंजीकृत समझौता हुआ था। कुल बिक्री मूल्य 20,000 रुपये तय किया गया था, जिसमें खरीदार ने 5,000 रुपये अग्रिम के रूप में दिए थे।
समझौते के अनुसार बिक्री पूरी नहीं होने पर खरीदार ने स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के लिए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 28 फरवरी 1979 को खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का आदेश दिया। इसके बाद 7 जून 1979 को न्यायालय के माध्यम से बिक्री विलेख निष्पादित किया गया और खरीदार को संपत्ति का कब्जा मिल गया। रिकॉर्ड के अनुसार खरीदार 1979 से ही संपत्ति पर कब्जे में था।
हाईकोर्ट ने 15 लाख रुपये रिफंड का दिया था आदेश
मामला आगे बढ़ने पर प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए ट्रायल कोर्ट के समझौते और प्रतिवादी के बचाव संबंधी निष्कर्षों को सही माना, लेकिन इतने वर्षों के अंतराल को देखते हुए बिक्री को बहाल करने के बजाय आर्थिक रूप से मामले को संतुलित करने का रास्ता अपनाया।
हाईकोर्ट ने 5,000 रुपये की अग्रिम राशि के बदले 15 लाख रुपये और ब्याज देने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पूरी हो चुकी बिक्री को केवल समय बीतने के कारण नहीं बदला जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को अस्थिर बताते हुए कहा कि यहां बिक्री वर्ष 1979 में ही न्यायालय के आदेश के तहत पूरी हो चुकी थी। खरीदार ने दशकों पहले रकम का भुगतान किया और तब से संपत्ति के स्वामित्व एवं कब्जे में रहा।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में केवल समय बीत जाने के आधार पर पहले से पूरी हो चुकी बिक्री को मौद्रिक भुगतान में बदलना उचित नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इक्विटी का लाभ उस पक्ष को मिलना चाहिए जिसने चार दशक से अधिक समय पहले रकम देकर संपत्ति का स्वामित्व और कब्जा प्राप्त किया था।
खरीदार का कब्जा बरकरार रहेगा
सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के फैसलों को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस समय खरीदार के कब्जे में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
साथ ही, हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रतिवादी द्वारा जमा की गई 15 लाख रुपये की राशि को उस पर अर्जित ब्याज सहित एक महीने के भीतर वापस करने का निर्देश दिया गया।
कानूनी संदर्भ: यह फैसला विशिष्ट निष्पादन, न्यायसंगत राहत और न्यायालय के आदेश से पहले ही पूरी हो चुकी संपत्ति बिक्री के संबंध में महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसका प्रभाव मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
स्रोत: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।