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“जांच पूरी हुए 2 माह बीते, फिर भी कार्रवाई नहीं! 8.87 लाख के मामले में आखिर किसका इंतजार?”

विधानसभा में उठा मामला, रायपुर से पहुंची पांच सदस्यीय जांच टीम; अब सवाल—जांच के बाद भी कार्रवाई कब?

NTN REPORT// जांजगीर-चांपा। जिला अस्पताल जांजगीर में परिवार कल्याण कार्यक्रम के अंतर्गत हितग्राहियों को भुगतान की जाने वाली राशि में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। करीब 8.87 लाख रुपये की राशि से जुड़े इस प्रकरण को जांजगीर विधायक व्यास कश्यप द्वारा विधानसभा में उठाए जाने के बाद शासन स्तर पर पांच सदस्यीय जांच दल गठित किया गया था।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जानकारी के अनुसार 27 जुलाई 2026 को रायपुर से पांच सदस्यीय जांच दल जिला अस्पताल जांजगीर पहुंचा और संबंधित दस्तावेजों एवं वित्तीय लेनदेन की जांच की। लेकिन जांच के बाद अब तक निर्णायक कार्रवाई सामने नहीं आने से पूरे मामले की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल: हितग्राहियों की राशि सुरक्षा गार्ड के खाते में क्यों पहुंची?

इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू सरकारी योजना की राशि के कथित लेनदेन से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार परिवार कल्याण कार्यक्रम के तहत हितग्राहियों को भुगतान की जाने वाली राशि अस्पताल प्रबंधन से जुड़ी प्रक्रिया के माध्यम से एक सुरक्षा गार्ड के बैंक खाते में पहुंची।

इसके बाद कथित तौर पर उक्त खाते से राशि निकाली गई। मामले में यह भी आरोप सामने आया है कि निकाली गई रकम तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ. कुजूर तक पहुंचाई गई।

यदि जांच में यह लेनदेन प्रमाणित होता है तो सवाल केवल राशि की आवाजाही का नहीं रहेगा, बल्कि यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि सरकारी योजना की राशि को निर्धारित हितग्राहियों के बजाय किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भेजने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया और इसकी अनुमति किसने दी?

अंकित ताम्रकार की भूमिका पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

इस प्रकरण में अस्पताल प्रबंधक अंकित ताम्रकार की भूमिका भी जांच के केंद्र में होना स्वाभाविक है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार राशि को सुरक्षा गार्ड के खाते में पहुंचाने की प्रक्रिया में उनका नाम सामने आ रहा है।

यही वह बिंदु है, जहां जांच को सबसे ज्यादा स्पष्टता की जरूरत है।

क्या अंकित ताम्रकार ने स्वयं राशि अंतरण की प्रक्रिया कराई?
क्या उन्हें इस राशि के स्रोत और वास्तविक उद्देश्य की जानकारी थी?
सुरक्षा गार्ड के खाते का इस्तेमाल किस आधार पर किया गया?
क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश या अधिकृत अनुमति थी?
और यदि राशि गलत खाते में चली गई तो उसे वापस सरकारी खाते में जमा करने की जरूरत क्यों पड़ी?

इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट में स्पष्ट होना बेहद जरूरी है।

राशि वापस जमा कर देने से खत्म नहीं होती जवाबदेही

प्रकरण में यह जानकारी सामने आई है कि मामला उजागर होने के बाद संबंधित राशि को दोबारा सरकारी खाते में जमा कर दिया गया।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि सरकारी राशि नियमों के अनुरूप ही संचालित हो रही थी, तो उसे किसी अन्य खाते में भेजने और फिर वापस सरकारी खाते में जमा करने की नौबत क्यों आई?

राशि वापस जमा हो जाना वित्तीय लेनदेन की पूरी प्रक्रिया को स्वतः वैध नहीं बना देता। जांच में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि धनराशि किस प्रक्रिया से निकली, किसके निर्देश पर निकली, किसने उसे प्राप्त किया और आखिरकार वापस सरकारी खाते में जमा करने की स्थिति क्यों बनी।

जिला अस्पताल के पुराने विवादों से भी जुड़ रहे सवाल

अस्पताल प्रबंधन को लेकर पिछले कुछ वर्षों में भी विभिन्न घटनाओं, प्रशासनिक विवादों, अव्यवस्थाओं और शिकायतों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आगजनी की घटना से लेकर अस्पताल में कर्मचारियों की हड़ताल और चिकित्सकों के बीच विवाद जैसे मामलों में अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली चर्चा में रही है।

हालांकि इन सभी घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी से जोड़ने के लिए अलग-अलग मामलों के आधिकारिक दस्तावेज और जांच निष्कर्ष आवश्यक हैं। इसलिए वर्तमान वित्तीय प्रकरण में भी अंकित ताम्रकार की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच रिपोर्ट और प्रमाणित अभिलेखों के आधार पर ही होना चाहिए।

सवाल यह भी—जांच हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं?

रायपुर से पांच सदस्यीय जांच दल के जिला अस्पताल पहुंचने के बाद अब लगभग दो माह का समय बीत चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया और उसके आधार पर अब तक क्या कार्रवाई की गई?

यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित हुई है तो जिम्मेदारी तय करने में देरी क्यों?

और यदि अनियमितता प्रमाणित नहीं हुई है तो संबंधित पक्ष को क्लीन चिट देने वाली जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

यही पारदर्शिता का असली पैमाना है।

अब जांच को बैंक खाते से लेकर जिम्मेदारी की पूरी कड़ी तक पहुंचना होगा

इस मामले में केवल फाइलों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। यदि शासन वास्तव में पूरे मामले की तह तक जाना चाहता है तो बैंक स्टेटमेंट, भुगतान आदेश, संबंधित स्वीकृतियां, लेखा अभिलेख, हितग्राहियों की भुगतान सूची और राशि अंतरण की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक है।

साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सुरक्षा गार्ड के खाते का इस्तेमाल क्यों हुआ और उस खाते से निकाली गई रकम की अंतिम प्राप्ति किसे हुई।

सुशासन की असली परीक्षा यही है

परिवार कल्याण जैसी योजना का उद्देश्य सीधे हितग्राहियों को लाभ पहुंचाना है। ऐसे में यदि जांच में सरकारी धन के संचालन में नियमों के विपरीत प्रक्रिया प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

अब गेंद शासन और स्वास्थ्य विभाग के पाले में है।

पांच सदस्यीय जांच दल ने क्या पाया?
8.87 लाख रुपये की पूरी लेनदेन श्रृंखला क्या थी?
सुरक्षा गार्ड का खाता क्यों इस्तेमाल हुआ?
अंकित ताम्रकार की वास्तविक भूमिका क्या थी?
तत्कालीन सिविल सर्जन की भूमिका क्या थी?
राशि वापस जमा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
और जांच के बाद कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है?

इन सवालों का जवाब अब जांच रिपोर्ट से ही मिलना चाहिए।

NTN REPORT इस पूरे मामले में आरोप तय नहीं कर रहा, बल्कि उन सवालों को सामने रख रहा है जिनका जवाब जिम्मेदार जांच और प्रशासनिक कार्रवाई से मिलना जरूरी है। यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई होना ही सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही और सुशासन की कसौटी होगी।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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