
सुप्रीम कोर्ट सख्त: अरावली हिल्स के सीमांकन की होगी वैज्ञानिक जांच, हाई-पावर्ड कमेटी गठित
NTN REPORT// नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला के सीमांकन और उसकी पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाते हुए एक हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) का गठन किया है। अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में कई बिंदुओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं और कहा है कि रिपोर्ट के कुछ निष्कर्ष स्पष्ट नहीं हैं। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह अरावली हिल्स की परिभाषा, सीमांकन और संरक्षण से जुड़े सभी विवादित मुद्दों की विस्तृत समीक्षा कर 31 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट पर पहले ही लग चुकी है रोक
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष 29 दिसंबर को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। अदालत का मानना था कि अरावली क्षेत्र के निर्धारण और उसके पर्यावरणीय महत्व का मूल्यांकन स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा दोबारा कराया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा था कि सभी पक्षों की राय लेने के बाद एक निष्पक्ष और वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की जाए, ताकि अरावली पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े विवादों का उचित समाधान निकाला जा सके।
कंचन देवी करेंगी समिति की अगुवाई
नई गठित हाई-पावर्ड कमेटी की अध्यक्षता 1991 बैच की भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी कंचन देवी करेंगी। समिति इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) के नेतृत्व में कार्य करेगी।
समिति में पर्यावरण, भूविज्ञान और वन अनुसंधान से जुड़े कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। इनमें पूर्व वन सर्वेक्षण महानिदेशक डॉ. सुभाष अशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौड़ तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख प्रो. अशोक के. भटनागर शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स, बेंगलुरु के प्रो. जगदीश कृष्णास्वामी और केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष सदस्य के रूप में समिति से जोड़ा गया है। आवश्यकता पड़ने पर समिति की अध्यक्ष इनके विशेषज्ञ सुझाव और सेवाएं ले सकेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय को निदेशक स्तर के एक अधिकारी को समिति का सदस्य सचिव नियुक्त करने का भी निर्देश दिया है।
किन प्रमुख मुद्दों की जांच करेगी समिति?
समिति अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में अपनाए गए वैज्ञानिक मानकों और निष्कर्षों की विस्तार से समीक्षा करेगी।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अरावली क्षेत्र को केवल उन पहाड़ियों तक सीमित करना उचित है, जो एक-दूसरे से 500 मीटर या उससे कम दूरी पर स्थित हैं। सुप्रीम कोर्ट को आशंका है कि इस मानक के कारण कई महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं, जिससे खनन और अन्य पर्यावरणीय रूप से हानिकारक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
समिति यह भी जांच करेगी कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली वे पहाड़ियां, जो 500 मीटर से अधिक दूरी पर स्थित हैं, क्या उन्हें भी एक ही प्राकृतिक एवं पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा माना जाना चाहिए।
इसके अलावा, पहाड़ियों के बीच स्थित क्षेत्रों में खनन गतिविधियों की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, इस विषय पर भी वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।
राजस्थान की पहाड़ियों को लेकर रिपोर्ट पर उठे सवाल
अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि राजस्थान में मौजूद 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर ऊंचाई के निर्धारित मानक को पूरा करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को यह जांचने का निर्देश दिया है कि यह आंकड़ा वैज्ञानिक और तथ्यात्मक रूप से कितना सही है। अदालत यह भी जानना चाहती है कि यदि यह मानक लागू किया जाता है तो क्या बड़ी संख्या में पहाड़ियां पर्यावरणीय संरक्षण से बाहर हो जाएंगी।

समिति यह भी मूल्यांकन करेगी कि वर्तमान नियमों और संरक्षण व्यवस्था में कोई संरचनात्मक कमी तो नहीं है और क्या अरावली पर्वतमाला के लिए व्यापक भूवैज्ञानिक, पारिस्थितिक और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।
सभी पक्षों की सहमति के बाद हुआ समिति का गठन
मामले की सुनवाई के दौरान 25 मई को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि एमिकस क्यूरी और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) द्वारा सुझाए गए चार विशेषज्ञों को समिति में शामिल किया जा सकता है। साथ ही ICFRE के महानिदेशक को समिति का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया था।
सभी पक्षों से चर्चा और विचार-विमर्श के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई-पावर्ड कमेटी के गठन को मंजूरी दी।
अरावली संरक्षण पर दूरगामी असर पड़ सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समिति की रिपोर्ट भविष्य में अरावली पर्वतमाला के संरक्षण, खनन गतिविधियों के नियमन और पर्यावरणीय नीतियों को प्रभावित कर सकती है। अरावली भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन, भूजल संरक्षण तथा जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
अब सभी की नजरें समिति की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि अरावली क्षेत्र का वास्तविक वैज्ञानिक सीमांकन क्या होना चाहिए और उसके संरक्षण के लिए भविष्य में किन उपायों की आवश्यकता होगी।
डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।