होर्मुज से मलक्का तक: हिंद महासागर में बढ़ी रणनीतिक जंग, चीन की सबसे बड़ी समुद्री कमजोरी पर नई रिपोर्ट का बड़ा खुलासा!
नई रिपोर्ट ने बदली चीन की समुद्री सुरक्षा को लेकर धारणा
NTN REPORT// चीन की समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर लंबे समय से माना जाता रहा है कि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) है। लेकिन अब एक नई अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए दावा किया है कि चीन के लिए वास्तविक खतरा मलक्का नहीं, बल्कि उससे हजारों किलोमीटर दूर स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) है।

लंदन स्थित प्रतिष्ठित सुरक्षा शोध संस्था IISS ने अपनी नई रिपोर्ट ‘एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा मूल्यांकन’ में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। यह रिपोर्ट सिंगापुर में आयोजित होने वाले प्रमुख सुरक्षा सम्मेलन शांगरीला डायलॉज से ठीक पहले जारी की गई है।
चीन की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है खाड़ी का तेल
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चीन अपनी औद्योगिक गतिविधियों, परिवहन और ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में तेल आयात करता है। इसका बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व के खाड़ी देशों से समुद्री मार्गों के जरिए चीन पहुंचता है।
तेल लेकर आने वाले जहाज सबसे पहले ईरान और ओमान के बीच स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरते हैं। इसके बाद वे हिंद महासागर में प्रवेश करते हैं, भारत के समुद्री क्षेत्र के पास से आगे बढ़ते हुए मलक्का जलडमरूमध्य पार करते हैं और अंततः चीन पहुंचते हैं।
‘मलक्का दुविधा’ नहीं, असली संकट होर्मुज?
अब तक सुरक्षा विशेषज्ञ चीन की तथाकथित “मलक्का दुविधा” (Malacca Dilemma) की चर्चा करते रहे हैं। उनका मानना था कि यदि किसी संघर्ष की स्थिति में मलक्का जलडमरूमध्य अवरुद्ध हो जाए, तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।
हालांकि IISS की रिपोर्ट का कहना है कि वास्तविक जोखिम मलक्का से पहले ही मौजूद है। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संकट पैदा होता है और तेल टैंकर वहां से नहीं निकल पाते, तो तेल हिंद महासागर तक पहुंचेगा ही नहीं। ऐसी स्थिति में मलक्का जलडमरूमध्य का महत्व स्वतः समाप्त हो जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी वास्तव में होर्मुज है, जो उसके रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र से काफी दूर स्थित है।
होर्मुज में बढ़ी भू-राजनीतिक संवेदनशीलता
रिपोर्ट में इस वर्ष आयोजित चीन, रूस और ईरान के संयुक्त नौसैनिक अभ्यास ‘समुद्री सुरक्षा बेल्ट-2026’ का भी उल्लेख किया गया है। यह सैन्य अभ्यास स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास आयोजित किया गया था।
इसके कुछ समय बाद ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव बढ़ने से इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही और तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए होर्मुज कितना महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग है।
केवल चीन ही नहीं, जापान भी खतरे की जद में
रिपोर्ट के मुताबिक यदि हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होता है, तो उसका असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा।
जापान भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए इन्हीं समुद्री मार्गों पर निर्भर है। ऐसे में होर्मुज या हिंद महासागर में किसी बड़े संकट का प्रभाव पूरे एशिया की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
हिंद महासागर में चार बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा
रिपोर्ट के अनुसार हिंद महासागर वर्तमान में चार प्रमुख शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।
भारत: क्षेत्रीय सुरक्षा का प्रमुख दावेदार
भारत हिंद महासागर को अपने प्राकृतिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है। हाल के वर्षों में भारत ने नौसैनिक गतिविधियां बढ़ाई हैं, कई देशों के साथ रक्षा सहयोग समझौते किए हैं और खुद को क्षेत्र का भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
फ्रांस: हिंद महासागर का कम चर्चित लेकिन मजबूत खिलाड़ी
फ्रांस के पास पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में महत्वपूर्ण सैन्य उपस्थिति है। अफ्रीका और रियूनियन द्वीप में मौजूद उसके सैन्य ठिकाने उसे इस क्षेत्र में मजबूत रणनीतिक बढ़त प्रदान करते हैं।
अमेरिका: डिएगो गार्सिया से मजबूत निगरानी
यूनाइटेड स्टेट हिंद महासागर के मध्य स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे के माध्यम से पूरे क्षेत्र पर नजर रखता है। यह अड्डा अमेरिकी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
चीन: बढ़ती ताकत लेकिन सीमित पहुंच
चीन ने पिछले दो दशकों में अपनी नौसेना का तेजी से विस्तार किया है। इसके बावजूद हिंद महासागर में उसकी परिचालन क्षमता और स्थायी उपस्थिति अभी भी भारत, फ्रांस और अमेरिका की तुलना में सीमित मानी जाती है।
चीन की नई रणनीति: दोस्ती, निवेश और सैन्य सहयोग
रिपोर्ट के अनुसार चीन यह समझता है कि वर्तमान परिस्थितियों में वह होर्मुज क्षेत्र में सीधे तौर पर अमेरिका, भारत या फ्रांस जैसी शक्तियों को चुनौती नहीं दे सकता।
इसी कारण वह हिंद महासागर से जुड़े देशों के साथ संबंध मजबूत करने की नीति अपना रहा है। चीन विभिन्न देशों को हथियार उपलब्ध करा रहा है, सैन्य अभ्यास कर रहा है और बंदरगाहों, सड़कों तथा बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ा रहा है।
इस रणनीति का उद्देश्य क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करना और अपनी समुद्री आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाना है।
चीन के सामने अभी भी कई चुनौतियां
रिपोर्ट का कहना है कि हिंद महासागर में प्रभाव स्थापित करना चीन के लिए उसके अपने समुद्री क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।
भारत, फ्रांस और अमेरिका पहले से ही यहां मजबूत सैन्य ढांचे, साझेदार देशों और रणनीतिक अनुभव के साथ मौजूद हैं। चीन को इस स्तर की उपस्थिति विकसित करने में अभी लंबा समय लग सकता है।
भारत, फ्रांस और अमेरिका के बीच भी नहीं है पूर्ण तालमेल
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत, फ्रांस और अमेरिका कई मामलों में सहयोगी हैं, लेकिन तीनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं और सुरक्षा चिंताएं अलग-अलग हैं।
इसी वजह से इन देशों के बीच समन्वय हमेशा उतना गहरा नहीं होता जितना क्षेत्रीय संतुलन के लिए संभव माना जाता है।
अमेरिका की दोहरी चुनौती
अमेरिका इस समय एक साथ दो महत्वपूर्ण मोर्चों पर सक्रिय है। एक ओर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में उसका मुख्य मुकाबला चीन से है, जबकि दूसरी ओर पश्चिमी हिंद महासागर और मध्य-पूर्व में उसे ईरान से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन हिंद महासागर में अपनी सैन्य गतिविधियां और बढ़ाता है, तो अमेरिका पर रणनीतिक दबाव और बढ़ सकता है।
भविष्य की तस्वीर: हिंद महासागर में बढ़ेगी चीन की मौजूदगी
रिपोर्ट का आकलन है कि आने वाले वर्षों में चीन हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक उपस्थिति को और मजबूत करेगा। विशेष रूप से उसके विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers) और लंबी दूरी की नौसैनिक क्षमताएं होर्मुज से लेकर पूर्वी एशिया तक समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
चीन की ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और कूटनीतिक हित हिंद महासागर से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह क्षेत्र आने वाले समय में विश्व की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में से एक का केंद्र बना रह सकता है।
(डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्टों, सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।)