Advertisment
नई दिल्लीराज्य एवं शहरसुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: SC/ST Act में आरोप तय करने के मानकों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश

केस टाइटल: डॉक्टर आनंद राय वर्सेस स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश & ANR.

NTN REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर आनंद राय वर्सेस स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश & ANR. मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए SC/ST Act के तहत आरोप तय करने और धारा 14A के अंतर्गत हाईकोर्ट की अपीलीय भूमिका को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि बिना प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आवश्यक कानूनी तत्वों के आपराधिक मुकदमा आगे बढ़ाना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है।

मामला क्या था?

यह मामला 15 नवंबर 2022 को मध्य प्रदेश के बछड़ापारा में भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम के दौरान हुई घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, JAYS संगठन से कथित रूप से जुड़े एक समूह ने अधिकारियों को रोका, वाहनों पर पथराव किया और कर्मचारियों पर हमला किया, जिसमें एक सुरक्षा अधिकारी घायल हुआ।

फाइल फोटो

डॉ. आनंद राय को आरोपियों में शामिल किया गया था। उनके खिलाफ IPC की धाराएं 147, 149, 341, 427, 353, 332, 333, 326, 352, 323 सहित SC/ST Act की धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत आरोप लगाए गए।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का रुख

ट्रायल कोर्ट ने आंशिक रूप से डिस्चार्ज आवेदन स्वीकार करते हुए कुछ आरोप हटाए, लेकिन उपरोक्त धाराओं के तहत आरोप कायम रखे।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने SC/ST Act की धारा 14A के तहत दायर अपील खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: आरोप तय करने का ‘टेस्ट’ क्या है?

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि आरोप तय करते समय यह देखा जाना चाहिए कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री, यदि ज्यों की त्यों स्वीकार कर ली जाए, तो क्या वह कथित अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों को दर्शाती है और क्या आरोपी के खिलाफ गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर विस्तृत साक्ष्य परीक्षण या गवाहों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन यह भी आवश्यक है कि बुनियादी कानूनी तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हों।

SC/ST Act के तहत आवश्यक तत्वों पर कोर्ट की स्पष्टता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं था कि कथित कृत्य पीड़ित की जाति के कारण किया गया या आरोपी को पीड़ित के SC/ST समुदाय से होने की जानकारी थी।

कोर्ट ने कहा कि जब CrPC की धारा 161 के बयानों में जातिसूचक गाली, जाति आधारित अपमान या विशेष रूप से जाति के आधार पर हमला करने का उल्लेख नहीं है, तो SC/ST Act की धाराओं को लागू करने का आधार कमजोर हो जाता है।

धारा 14A के तहत हाईकोर्ट की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC/ST Act की धारा 14A के तहत हाईकोर्ट एक फर्स्ट अपीलेट कोर्ट की भूमिका निभाता है, न कि केवल रिविजनल या सुपरवाइजरी कोर्ट की।

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को स्वतंत्र रूप से रिकॉर्ड का मूल्यांकन करना चाहिए। यदि वह स्पेशल कोर्ट के आदेश से सहमत भी हो, तो उसे अपने फैसले में यह दर्शाना होगा कि उसने स्वतंत्र जांच और विवेक का प्रयोग किया है।

सिर्फ मशीनरी तरीके से आदेश की पुष्टि करना अपीलीय अधिकार क्षेत्र के दायित्व के अनुरूप नहीं है।

‘प्रोसेस ही सजा न बन जाए’ — सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामला न होने के बावजूद किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया में धकेलना उसे अनावश्यक मानसिक दबाव, सामाजिक कलंक और अस्थिरता में डालना है।

न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट न्याय प्रणाली का चेहरा होता है और प्रारंभिक स्तर पर दिखाई गई संवेदनशीलता, निष्पक्षता और विधिक अनुशासन पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता तय करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act के तहत लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया। हालांकि IPC की अन्य धाराओं के संबंध में मामला कानून के अनुसार आगे बढ़ाने के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके समक्ष मुख्य मुद्दा केवल SC/ST Act के तहत आरोपों की वैधता का था।

फैसले का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:

  • SC/ST Act के तहत आरोप तय करने के लिए जाति-आधारित उद्देश्य या ज्ञान का प्रथम दृष्टया संकेत आवश्यक है।
  • हाईकोर्ट को धारा 14A के तहत स्वतंत्र अपीलीय अधिकार का गंभीरता से उपयोग करना होगा।
  • आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग दंड के रूप में नहीं किया जा सकता।

यह फैसला भविष्य में SC/ST Act से जुड़े मामलों में आरोप तय करने और अपील सुनवाई की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
Back to top button
error: Content is protected !!