भारत में तेजी से बढ़ रही IVF की मांग: 2028 तक 5.50 लाख साइकिल का अनुमान, महिलाओं में PCOS तो पुरुषों में कम स्पर्म काउंट बड़ी चुनौती
NTN REPORT// स्वास्थ्य समाचार | माता-पिता बनने का सपना पूरा करने के लिए देश में अब पहले से अधिक दंपती इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) यानी कृत्रिम प्रजनन तकनीक का सहारा ले रहे हैं। बदलती जीवनशैली, देर से विवाह, बढ़ती उम्र और महिला-पुरुषों में प्रजनन संबंधी समस्याओं के कारण आईवीएफ उपचार की मांग में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बांझपन की समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पुरुषों में भी शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएं सामने आ रही हैं।

उपलब्ध उद्योग संबंधी आंकड़ों के अनुसार, भारत में जून 2024 तक लगभग 3.20 लाख आईवीएफ साइकिल दर्ज की गई थीं। अनुमान है कि यह संख्या वर्ष 2028 तक बढ़कर 5.50 लाख तक पहुंच सकती है। हालांकि, आईवीएफ उपचार की बढ़ती मांग को सीधे तौर पर देश की खराब सेहत का संकेत मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे प्रजनन संबंधी समस्याओं के साथ-साथ जागरूकता, जांच की उपलब्धता और उपचार तक बढ़ती पहुंच जैसे कारक भी महत्वपूर्ण हैं।
2028 तक 5.50 लाख आईवीएफ साइकिल का अनुमान
दिल्ली के अपोलो स्पेक्ट्रा अस्पताल की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. मेघा मित्तल के अनुसार, भारत में वर्ष 2023 तक हर साल लगभग 2 लाख से 2.5 लाख आईवीएफ साइकिल होती थीं। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह संख्या बढ़कर सालाना 5 लाख से 6 लाख तक पहुंच सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रजनन उपचार के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ने के साथ ही आईवीएफ केंद्रों में परामर्श लेने वाले दंपतियों की संख्या भी बढ़ रही है। पहले जहां कई दंपती सामाजिक संकोच या जानकारी के अभाव में उपचार लेने से बचते थे, वहीं अब वे विशेषज्ञों से सलाह लेकर अपनी समस्या का समाधान तलाश रहे हैं।
आईवीएफ उपचार में एक साइकिल का अर्थ उपचार की एक प्रक्रिया से है। एक साइकिल में गर्भधारण होना जरूरी नहीं है। कुछ मामलों में सफल परिणाम के लिए एक से अधिक साइकिल की आवश्यकता पड़ सकती है।
IVF परामर्श और उपचार की मांग में बढ़ोतरी
क्रिस्टा आईवीएफ की डॉ. निधि सहरावत के अनुसार, आईवीएफ के बारे में जानकारी लेने और चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त करने वाले दंपतियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
उनके द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में आईवीएफ परामर्श में 33.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि में आईवीएफ साइकिल की संख्या में 58.6 प्रतिशत और मरीजों की संख्या में 40.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी बताई गई है।
ये आंकड़े संबंधित संस्थान के बताए गए हैं। इन्हें देशभर में आईवीएफ उपचार की मांग में हुई वृद्धि का आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
महिलाओं में PCOS, पुरुषों में कम स्पर्म काउंट बड़ी समस्या
प्रजनन संबंधी समस्याओं में महिलाओं के लिए पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) और पुरुषों के लिए शुक्राणुओं की कम संख्या या उनकी गुणवत्ता में कमी प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं।
डॉ. निधि सहरावत के अनुसार, उनके केंद्र में आईवीएफ उपचार के लिए आने वाली महिलाओं में लगभग 35 प्रतिशत महिलाएं पीसीओएस से प्रभावित हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनके अनुभव में लगभग आधे मामलों में पुरुषों से संबंधित प्रजनन समस्याएं भी सामने आती हैं।
पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होने की स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है। इसके अतिरिक्त शुक्राणुओं की गतिशीलता और गुणवत्ता में कमी भी गर्भधारण में परेशानी का कारण बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बांझपन की समस्या को केवल महिलाओं से जोड़कर देखना सही नहीं है। गर्भधारण में कठिनाई होने पर महिला और पुरुष, दोनों की जांच जरूरी हो सकती है। समस्या की सही वजह का पता चलने के बाद ही उपयुक्त उपचार निर्धारित किया जा सकता है।
देर से शादी और बढ़ती उम्र भी बन रहे कारण
एलांटिस हेल्थकेयर के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता के अनुसार, आईवीएफ की बढ़ती मांग के पीछे जीवनशैली और चिकित्सकीय कारणों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें देर से शादी करना और अधिक उम्र में परिवार शुरू करने का निर्णय भी शामिल है।
महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ अंडाणुओं की संख्या और गुणवत्ता में प्राकृतिक रूप से गिरावट आती है। इससे गर्भधारण की संभावना प्रभावित हो सकती है। वहीं, पीसीओएस जैसी स्थितियां कुछ महिलाओं में अंडोत्सर्जन को प्रभावित कर सकती हैं।
पुरुषों में भी बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्षमता में बदलाव आ सकते हैं। इसके अलावा खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी, मोटापा, धूम्रपान, तंबाकू का सेवन और कुछ चिकित्सकीय स्थितियां प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि, इन सभी कारकों का प्रभाव हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। आईवीएफ की आवश्यकता का निर्धारण केवल उम्र या किसी एक बीमारी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भधारण में परेशानी होने पर सही समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना महत्वपूर्ण है।
सामान्य तौर पर इन स्थितियों में डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए:
- 35 वर्ष से कम उम्र की महिलाएं: यदि नियमित रूप से बिना गर्भनिरोधक के संबंध बनाने के बावजूद 12 महीने तक गर्भधारण नहीं होता है, तो दंपती को जांच करानी चाहिए।
- 35 से 40 वर्ष की महिलाएं: छह महीने तक प्रयास करने के बाद भी गर्भधारण नहीं होने पर चिकित्सकीय जांच कराने की सलाह दी जाती है।
- 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं: गर्भधारण की योजना बनाते समय जल्द चिकित्सकीय परामर्श लेना उचित है।
- पीसीओएस या अनियमित माहवारी: यदि पहले से पीसीओएस है, माहवारी अनियमित रहती है या अंडोत्सर्जन से जुड़ी समस्या है, तो एक वर्ष तक प्रतीक्षा करने के बजाय पहले ही डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है।
- पुरुषों में प्रजनन संबंधी समस्या: यदि शुक्राणुओं की संख्या या गुणवत्ता को लेकर संदेह है अथवा पहले से कोई संबंधित चिकित्सकीय समस्या है, तो जांच कराना जरूरी है।
- अन्य चिकित्सकीय स्थितियां: प्रजनन अंगों से जुड़ी बीमारी, पहले हुए उपचार या ऐसी कोई स्थिति जो गर्भधारण को प्रभावित कर सकती है, तो विशेषज्ञ से समय रहते परामर्श लेना चाहिए।
ध्यान रखें कि आईवीएफ हर दंपती के लिए पहला या एकमात्र विकल्प नहीं है। कई मामलों में दवाओं, जीवनशैली में बदलाव या अन्य उपचारों से भी गर्भधारण संभव हो सकता है। उपचार का चयन जांच के नतीजों, उम्र और संबंधित चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
जागरूकता और समय पर जांच जरूरी
भारत में आईवीएफ उपचार की बढ़ती मांग प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं और उनके समाधान के प्रति बढ़ती जागरूकता को भी दर्शाती है। हालांकि, गर्भधारण में कठिनाई होने पर केवल महिला को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। पुरुष और महिला, दोनों का स्वास्थ्य इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि दंपती प्रजनन संबंधी समस्याओं को लेकर संकोच न करें और आवश्यकता पड़ने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें। समय पर जांच, सही जानकारी और व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार उपचार से माता-पिता बनने की संभावनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है। इसमें दी गई स्वास्थ्य संबंधी जानकारी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। यह चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं है। किसी भी जांच या उपचार का निर्णय योग्य चिकित्सक की सलाह से लें।