यूपीआई पर एमडीआर को लेकर सियासी घमासान, संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट पर आमने-सामने सरकार और विपक्ष
NTN REPORT// नई दिल्ली। यूपीआई भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति तक पहुंच गया है। सरकार जहां समिति की 44वीं ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ का हवाला देते हुए कह रही है कि समिति ने यूपीआई के लिए एक स्तरीय एमडीआर अथवा टिकाऊ राजस्व मॉडल तैयार करने की जरूरत बताई थी, वहीं विपक्षी सांसदों का दावा है कि समिति में एमडीआर को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे और वर्तमान में लागू किए जाने वाले शुल्क का कोई विशिष्ट प्रस्ताव समिति के सामने रखा ही नहीं गया था।

विवाद का एक प्रमुख बिंदु यह भी है कि रिपोर्ट को अंतिम रूप दिए जाने के समय समिति की बैठक में कांग्रेस के पांच सांसद मौजूद थे, लेकिन प्रकाशित कार्यवाही में उनकी ओर से कोई औपचारिक असहमति दर्ज नहीं है। सरकार इसी तथ्य को आधार बनाकर कांग्रेस के मौजूदा विरोध पर सवाल उठा रही है। दूसरी ओर विपक्षी सांसदों का कहना है कि समिति की बंद कमरे में हुई चर्चाओं और प्रकाशित रिपोर्ट में दर्ज औपचारिक असहमति को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
सरकार ने समिति की रिपोर्ट का दिया हवाला
सरकारी सूत्रों ने संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 44वीं ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ का हवाला देते हुए कहा है कि रिपोर्ट में यूपीआई के लिए एक स्तरीय एमडीआर अथवा राजस्व मॉडल विकसित करने और उसे जल्द लागू करने की जरूरत बताई गई थी।
सरकार के अनुसार, 12 अगस्त को रिपोर्ट को अपनाए जाने के समय कांग्रेस के पांच सांसद—पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ—बैठक में मौजूद थे। सरकार का कहना है कि प्रकाशित कार्यवाही में इन सांसदों की ओर से किसी औपचारिक असहमति का उल्लेख नहीं है।
सरकार इसी आधार पर यह तर्क दे रही है कि कांग्रेस के सांसद जिस संसदीय समिति का हिस्सा थे, उसने यूपीआई के लिए लंबे समय तक टिकाऊ वित्तीय या राजस्व मॉडल की आवश्यकता को स्वीकार किया था।
राहुल गांधी ने बताया ‘यूपीआई टैक्स’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नए शुल्क ढांचे की आलोचना करते हुए इसे ‘यूपीआई टैक्स’ बताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस कदम से अमेरिका को लाभ हो सकता है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में झुक रहे हैं।
राहुल गांधी ने सरकार से नए शुल्क ढांचे को वापस लेने की मांग की है।
हालांकि, सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित शुल्क ग्राहकों से नहीं लिया जाएगा, बल्कि पात्र कारोबारी लेनदेन पर व्यापारी स्तर पर लागू होगा। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य यूपीआई भुगतान व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ वित्तीय ढांचा तैयार करना है।
विपक्ष का पलटवार—एमडीआर पर समिति में उठे थे सवाल
विपक्षी सांसद सरकार की इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। एक विपक्षी सांसद ने दावा किया है कि समिति की बैठकों के दौरान एमडीआर को लेकर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि भाजपा के सांसदों की ओर से भी सवाल उठाए गए थे।
सांसद के मुताबिक, समिति के सदस्यों ने रिपोर्ट में की गई सिफारिशों में बदलाव की मांग भी की थी। उनका आरोप है कि समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने संसद सत्र समाप्त होने से पहले रिपोर्ट जमा करने की समय-सीमा का हवाला देते हुए रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया और सदस्यों की ओर से सुझाए गए बदलावों को उसमें शामिल नहीं किया गया।
हालांकि, यह दावा प्रकाशित समिति रिकॉर्ड में दर्ज औपचारिक स्थिति से अलग है। उपलब्ध प्रकाशित कार्यवाही में संबंधित सांसदों की ओर से औपचारिक असहमति दर्ज नहीं दिखाई देती। ऐसे में विवाद अब इस सवाल पर केंद्रित हो गया है कि समिति की बैठकों में हुई चर्चाओं और प्रकाशित अंतिम रिपोर्ट में दर्ज औपचारिक मतभेद को किस तरह देखा जाए।
गौरव गोगोई बोले—खास यूपीआई शुल्क प्रस्ताव समिति के सामने आया ही नहीं
कांग्रेस सांसद और लोकसभा में पार्टी के उपनेता गौरव गोगोई ने सरकार के दावे को खारिज किया है।
गोगोई के मुताबिक, वित्त संबंधी स्थायी समिति ने हाल में घोषित किए गए विशिष्ट यूपीआई शुल्क प्रस्ताव पर चर्चा नहीं की थी। उनका कहना है कि जब वित्तीय सेवा विभाग समिति के सामने आया था, उस समय उसके पास यूपीआई पर इस तरह का कोई विशिष्ट शुल्क प्रस्ताव मौजूद नहीं था।
गोगोई का दावा है कि समिति की बैठकों में एमडीआर की आवश्यकता को लेकर सवाल जरूर उठाए गए थे, लेकिन सरकारी प्रतिनिधियों की ओर से इन सवालों पर स्पष्ट या संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
मनीष तिवारी का दावा—दर, रकम और छूट की सीमा पर नहीं हुई चर्चा
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी गौरव गोगोई के दावे का समर्थन किया है।
तिवारी के मुताबिक, 15 अक्टूबर से लागू होने वाले एमडीआर के संबंध में समिति के सामने कोई विशिष्ट प्रस्ताव नहीं रखा गया था। उनका कहना है कि एमडीआर की दर कितनी होगी, शुल्क की राशि कितनी होगी, अधिकतम सीमा क्या होगी और किन लेनदेन को इससे छूट दी जाएगी—इन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर समिति में चर्चा नहीं हुई थी।
तिवारी ने यह भी कहा कि एमडीआर की जरूरत और उसकी उपयोगिता को लेकर समिति की अलग-अलग बैठकों में सदस्यों ने सवाल उठाए थे।
उनका कहना है कि समिति की गोपनीय कार्यवाही का हवाला देते हुए केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि बैठक में मौजूद सांसदों ने मौजूदा शुल्क व्यवस्था का समर्थन किया था।
15 अक्टूबर से लागू होगा नया एमडीआर ढांचा
सरकार के बताए नए शुल्क ढांचे के अनुसार, 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के पात्र कारोबारी यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा।
इस शुल्क का भुगतान ग्राहक के बजाय व्यापारी पक्ष से किया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के पात्र लेनदेन पर एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है।
व्यक्ति से व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई लेनदेन पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।
छोटे कारोबारियों को भी मिलेगी राहत
नए प्रावधान में छोटे कारोबारियों के लिए भी छूट का प्रावधान बताया गया है। यूपीआई क्यूआर के माध्यम से महीने में 1 लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को इस एमडीआर के दायरे से बाहर रखा गया है।
इसके अलावा कुछ आवश्यक सेवाओं के लिए अलग दर निर्धारित किए जाने की बात कही गई है।
सरकार का कहना है कि नए शुल्क का सीधा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला जाएगा। सरकार के अनुसार, भुगतान व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने, साइबर सुरक्षा बढ़ाने और डिजिटल भुगतान के नेटवर्क तथा बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश के लिए एक टिकाऊ वित्तीय मॉडल आवश्यक है।
विवाद का केंद्र क्या है?
यूपीआई एमडीआर को लेकर मौजूदा विवाद मुख्य रूप से दो अलग-अलग दावों के बीच है।
सरकार का पक्ष: वित्त संबंधी स्थायी समिति ने यूपीआई के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल और एमडीआर जैसी व्यवस्था की आवश्यकता को स्वीकार किया था। रिपोर्ट को अपनाते समय मौजूद कांग्रेस सांसदों ने प्रकाशित रिकॉर्ड में औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई।
विपक्ष का पक्ष: समिति ने किसी विशिष्ट एमडीआर दर, शुल्क की राशि, अधिकतम सीमा या छूट के मौजूदा ढांचे पर मंजूरी नहीं दी थी। विपक्षी सांसदों का दावा है कि बैठकों में एमडीआर की आवश्यकता को लेकर सवाल उठाए गए थे और सदस्यों के सुझावों को अंतिम रिपोर्ट में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया।
इस तरह यूपीआई शुल्क का विवाद अब केवल शुल्क लागू करने के फैसले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संसदीय समिति की सिफारिशों की व्याख्या और उसके रिकॉर्ड को लेकर भी राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है। इसमें सरकार और विपक्ष की ओर से सामने रखे गए दावों को संबंधित पक्षों के बयान के रूप में प्रस्तुत किया गया है।