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राजनीति

टीएमसी में बगावत! ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा बने ममता बनर्जी के लिए चुनौती, 59 विधायकों के समर्थन से बढ़ा सियासी संकट

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल

NTN REPORT// पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर उभरी बगावत सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। पार्टी से निष्कासित किए गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती बनते नजर आ रहे हैं।

संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी(फाइल फोटो)

दोनों नेताओं ने चुनाव जीतने के बाद पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया था। इसके बाद टीएमसी ने उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए निष्कासन की कार्रवाई की। हालांकि, यह फैसला अब पार्टी नेतृत्व के लिए उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है।


59 विधायकों के समर्थन से बढ़ी टीएमसी की मुश्किल

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि टीएमसी के 80 में से करीब 59 विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को हस्ताक्षरयुक्त पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की मांग की है।

यदि यह समर्थन राजनीतिक रूप से कायम रहता है तो टीएमसी के भीतर बड़ा संगठनात्मक संकट खड़ा हो सकता है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में इन दोनों नेताओं की भूमिका और राजनीतिक पृष्ठभूमि चर्चा का विषय बनी हुई है।


कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी?

छात्र राजनीति से राज्यसभा तक का सफर

ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। कोलकाता के आशुतोष कॉलेज और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त करने वाले ऋतब्रत ने राजनीति में कदम वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के माध्यम से रखा था।

वे करीब आठ वर्षों तक एसएफआई के राष्ट्रीय महासचिव रहे और वामपंथी राजनीति के युवा चेहरों में गिने जाते थे।


34 साल की उम्र में बने राज्यसभा सांसद

वर्ष 2014 में माकपा ने उन पर भरोसा जताते हुए मात्र 34 वर्ष की उम्र में राज्यसभा भेजा। लेकिन कुछ वर्षों बाद उनकी जीवनशैली और पार्टी नेतृत्व पर सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया।

महंगी एप्पल वॉच, लग्जरी पेन और शीर्ष नेताओं के खिलाफ बयानबाजी को लेकर माकपा ने वर्ष 2017 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था।


माकपा छोड़कर टीएमसी में हुए शामिल

वामपंथी राजनीति से अलग होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी का समर्थन करते हुए तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। उन्होंने उस समय ममता बनर्जी को “वास्तविक वामपंथी राजनीति की प्रतिनिधि” बताया था।

टीएमसी ने उन्हें अपने ट्रेड यूनियन संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी। बाद में वर्ष 2024 में जवाहर सरकार के इस्तीफे के बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा।


विधायक बनने के बाद शुरू हुआ विवाद

वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ऋतब्रत बनर्जी उलुबेरिया पूर्व सीट से टीएमसी के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए। चुनाव जीतने के कुछ समय बाद उनकी मुलाकात विपक्ष के प्रमुख नेता सुवेंदु अधिकारी से हुई, जिसके बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया।

टीएमसी नेतृत्व ने इसे पार्टी लाइन के खिलाफ कदम मानते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया। हालांकि अब ऋतब्रत बनर्जी पार्टी के कई विधायकों का समर्थन जुटाकर संगठन में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।


कौन हैं संदीपन साहा?

राजनीतिक परिवार से रखते हैं संबंध

संदीपन साहा का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत शांत लेकिन प्रभावशाली माना जाता है। वे एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता स्वर्ण कमल साहा कोलकाता के प्रभावशाली नेताओं और पूर्व विधायक के रूप में जाने जाते रहे हैं।


कॉरपोरेट और कारोबार से राजनीति तक

संदीपन साहा ने भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) कलकत्ता से पीजीडीएम की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय कॉरपोरेट क्षेत्र में काम किया और फिर अपना व्यवसाय शुरू किया।

राजनीति में उनकी सक्रिय शुरुआत कोलकाता नगर निगम में पार्षद के रूप में हुई। इसके बाद उन्होंने संगठन के भीतर लगातार अपनी पकड़ मजबूत की।


पहली बार विधायक बनकर पहुंचे विधानसभा

वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में संदीपन साहा ने एंटाली विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार प्रियंका टिबरेवाल को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया।

हालांकि विधायक बनने के बाद उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के साथ मिलकर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोल दिया। इसके बाद टीएमसी नेतृत्व ने उन्हें भी पार्टी से निष्कासित कर दिया।


क्या टीएमसी में टूट की स्थिति बन रही है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को वास्तव में बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन प्राप्त है तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए गंभीर राजनीतिक संकट साबित हो सकता है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इस दावे को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।

फिलहाल बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में विधानसभा और संगठनात्मक स्तर पर होने वाले घटनाक्रम तय करेंगे कि यह बगावत महज असंतोष है या फिर टीएमसी के भीतर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत।


डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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