
क्या है कोडवा विवाह? जिससे एक हुए रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा
NTN NEWS REPORT// उदयपुर। फिल्मी दुनिया के चर्चित कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा गुरुवार को शाही अंदाज में विवाह बंधन में बंध गए। राजस्थान के उदयपुर में आयोजित इस भव्य समारोह में दोनों ने दो अलग-अलग परंपराओं के अनुसार शादी रचाई। पहले तेलुगु रीति-रिवाजों से विवाह हुआ, जिसमें सप्तपदी, मंगलसूत्र, शृंगार और वैदिक मंत्रोच्चार शामिल रहे। इसके बाद शाम को रश्मिका की परंपरा के अनुसार कोडवा रीति से विवाह संपन्न हुआ। इसी के साथ कोडवा समाज और उसकी अनूठी विवाह परंपरा चर्चा में आ गई है।
कोडवा समाज कौन है?
कोडवा समुदाय कर्नाटक के कोडगु जिले (जिसे कूर्ग भी कहा जाता है) में निवास करने वाली एक गौरवशाली जनजाति है। हरे-भरे पहाड़ों और कॉफी बागानों से घिरा यह इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। कोडवा लोग अपनी अलग भाषा “कोडवा तक्क” बोलते हैं, जो कन्नड़ से भिन्न है। उनकी पहचान समृद्ध परंपराओं, विशिष्ट पहनावे और वीरता से जुड़ी रही है। इतिहास में कोडवा समुदाय की जड़ें योद्धा परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं। यही कारण है कि इस समाज में हथियारों को सम्मान और आत्मगौरव का प्रतीक माना जाता है। भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ के. एम. करियप्पा और प्रसिद्ध सैन्य अधिकारी के. एस. थिमैया इसी समुदाय से थे। आज भी बड़ी संख्या में कोडवा पुरुष भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
त्योहार और परंपराएं
कोडवा समुदाय के प्रमुख त्योहारों में पुत्तारी (फसल उत्सव), कैलपोड (हथियार पूजा) और कावेरी संक्रामना शामिल हैं। कैलपोड के दौरान पारंपरिक हथियारों की पूजा की जाती है, जो उनके योद्धा इतिहास की झलक है। कावेरी संक्रामना में कावेरी नदी को मां के रूप में पूजा जाता है। पुत्तारी में नए धान की पूजा कर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।
ओक्का सिस्टम और ऐनमने की परंपरा
कोडवा समाज की सामाजिक संरचना ‘ओक्का’ प्रणाली पर आधारित है। ओक्का का अर्थ है संयुक्त परिवार या कबीलाई व्यवस्था। हर ओक्का का एक पैतृक घर होता है, जिसे ‘ऐनमने’ कहा जाता है। यह घर केवल निवास स्थान नहीं, बल्कि पूरे कबीले की पहचान और इतिहास का प्रतीक होता है।
परिवार में बुजुर्गों को विशेष सम्मान दिया जाता है और महत्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। महिलाओं की भूमिका भी समाज में महत्वपूर्ण और सम्मानजनक मानी जाती है।
पारंपरिक पहनावा और भोजन
कोडवा पुरुष ‘कुप्पया’ नामक लंबा कोट पहनते हैं, जिसे कमर पर पट्टे से बांधा जाता है। सिर पर विशेष पगड़ी (मंडे तुनी) और कमर में पारंपरिक खंजर ‘ओडी काठी’ धारण की जाती है। महिलाओं की साड़ी पहनने की शैली अन्य दक्षिण भारतीय समुदायों से अलग होती है, जिसमें पल्लू पीछे से लाकर आगे की ओर बांधा जाता है। वे सोने के पारंपरिक आभूषण पहनती हैं, जिनमें ‘कसिना सारा’ (सोने के सिक्कों की माला) विशेष है।
भोजन में स्थानीय मसालों और मांसाहारी व्यंजनों का प्रमुख स्थान है। सबसे प्रसिद्ध व्यंजन ‘पंडी करी’ (पोर्क करी) है। इसके अलावा कड़ंबुट्टू (चावल के गोल बॉल्स), नूलपुट्टू (चावल से बनी सेवई) और बांस की कोपलों से बने व्यंजन भी लोकप्रिय हैं।
कैसी होती है कोडवा विवाह परंपरा?
कोडवा विवाह सादगी और परंपरा का सुंदर मेल है। यहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो ओक्का (कबीले) का मिलन माना जाता है। शादी से पहले दोनों परिवारों के बुजुर्ग आपसी सहमति से संबंध तय करते हैं। ज्योतिष का महत्व अपेक्षाकृत कम होता है, जबकि पारिवारिक सामंजस्य को प्राथमिकता दी जाती है। विवाह सामान्यतः ‘ऐनमने’ यानी पैतृक घर में संपन्न होता है। यदि समारोह कहीं और हो, तब भी ऐनमने में आशीर्वाद लेना अनिवार्य माना जाता है।
कोडवा विवाह में अग्नि के सात फेरे जैसी उत्तर भारतीय परंपरा नहीं होती। इसके स्थान पर बुजुर्ग दूल्हा-दुल्हन को चावल और फूलों से आशीर्वाद देते हैं। एक प्रमुख रस्म में दूल्हा अपनी दुल्हन के सिर पर अक्षत और फूल बरसाता है, जो उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने का प्रतीक होता है। विवाह के दौरान पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और ‘उम्मत्ताट’ नामक लोकनृत्य किया जाता है। समारोह में पारंपरिक हथियारों की उपस्थिति भी देखी जाती है, जो उनके योद्धा इतिहास और सांस्कृतिक गर्व का प्रतीक है।
दो परंपराओं का संगम बनी यह शादी
रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा ने अपनी शादी में तेलुगु और कोडवा दोनों परंपराओं का सम्मान करते हुए विवाह रचाया। इस अनूठे संगम ने न केवल उनके रिश्ते को खास बनाया, बल्कि देशभर में कोडवा समाज की समृद्ध संस्कृति और विवाह परंपरा को भी चर्चा में ला दिया।