Advertisment
Advertisment
भारत

हिमाचल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! मंदिर के दान का सरकारी योजनाओं में उपयोग भक्तों के विश्वास से धोखा — कोर्ट की सख्त टिप्पणी

NTN NEWS REPORT// हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में कहा है कि मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया दान केवल देवी-देवताओं की सेवा, मंदिर के रखरखाव और धार्मिक कार्यों के लिए ही उपयोग किया जा सकता है।

फाइल फोटो, सोर्स सोशल मीडिया

कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी कि मंदिर के दान को राज्य के सामान्य राजस्व या सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में खर्च करना भक्तों के अटूट विश्वास के साथ धोखा है।

⚖️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस राकेश कैंथला की खंडपीठ ने कहा — “मंदिर के कोष का हर रुपया मंदिर के धार्मिक उद्देश्यों या धर्मार्थ कार्यों के लिए ही उपयोग किया जाना चाहिए। इसे राज्य के सामान्य राजस्व की तरह नहीं देखा जा सकता और न ही किसी सरकारी योजना में डायवर्ट किया जा सकता है।”

न्यायालय ने कहा कि भक्त यह पवित्र भावना लेकर दान देते हैं कि उनका चढ़ावा सनातन धर्म के प्रसार और मंदिर के संरक्षण में लगेगा, न कि किसी सरकारी परियोजना में।
सरकार द्वारा ऐसे कोषों का उपयोग “भक्तों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना” है।

📜 धार्मिक उद्देश्यों के लिए धन का उपयोग अनिवार्य

यह फैसला उस याचिका पर आया, जिसमें राज्य सरकार को “हिंदू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1984” का सख्ती से पालन कराने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

कोर्ट ने कहा कि इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है —
मंदिरों की संपत्तियों और कोष की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा धन का उपयोग केवल धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए करना।

“हिंदू धर्म एक जीवन पद्धति”

न्यायालय ने अपने निर्णय में हिंदू धर्म के व्यापक दर्शन पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि — “हिंदू धर्म किसी एक ईश्वर या पुस्तक तक सीमित नहीं, बल्कि यह जीवन जीने का एक तरीका है।”

कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में मंदिरों ने सामाजिक सुधार और एकजुटता के केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मंदिर कोष के उपयोग के लिए विशेष निर्देश

हाईकोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए कि मंदिरों का धन केवल धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए ही प्रयोग हो।

इनमें प्रमुख बिंदु शामिल हैं:

1. वेदों एवं संस्कृत की शिक्षा को बढ़ावा देना।                       2. मंदिरों और गौशालाओं का उचित रखरखाव करना।           3. योग एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना।         4. गरीबों, असहायों और बुजुर्गों को सहायता प्रदान करना।     5. समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव को समाप्त करना।

संविधानिक दृष्टि से स्पष्ट संकेत

कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। सभी नागरिकों और संस्थानों का दायित्व है कि वे एक स्वस्थ, सामंजस्यपूर्ण और प्रगतिशील भारतीय समाज की स्थापना में योगदान दें।

यह फैसला न केवल मंदिर प्रबंधन के लिए दिशा तय करता है, बल्कि सरकारों को भी यह याद दिलाता है कि धार्मिक आस्था और दान की पवित्रता के साथ कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
Back to top button
error: Content is protected !!