हाथ में सिगरेट, चेहरे पर एटीट्यूड: बॉलीवुड में फिर लौट रही ‘स्मोकिंग’ की ग्लैमरस छवि
‘लव एंड वॉर’ के पोस्टर के बाद छिड़ी बहस, फिल्मों में सिगरेट कैसे बनी मर्दानगी, विद्रोह, दर्द और रहस्य का सिनेमाई प्रतीक
NTN REPORT// बॉलीवुड में सिगरेट का इस्तेमाल सिर्फ धूम्रपान दिखाने तक सीमित नहीं रहा है। दशकों से हिंदी सिनेमा में सिगरेट को किरदार की पहचान, उसके स्वभाव, तनाव, विद्रोह, मर्दानगी और रहस्यमय व्यक्तित्व को दिखाने वाले एक दृश्य प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। अब संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘लव एंड वॉर’ के पोस्टर में विक्की कौशल के सिगरेट वाले लुक ने इस पुराने सिनेमाई चलन को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

पोस्टर में हाथ में लाइटर, होंठों के बीच सिगरेट और कैमरे की ओर सीधी नजर दिखाई देती है। यह दृश्य किरदार को केवल धूम्रपान करते हुए नहीं दिखाता, बल्कि उसके व्यक्तित्व में एक खास तरह का रफ, रहस्यमय और सख्त अंदाज जोड़ता है। इसी तरह के दृश्य हाल के वर्षों में ‘एनिमल’ और ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों में भी देखने को मिले हैं।
सिनेमा में सिगरेट की कहानी नई नहीं
हिंदी फिल्मों में सिगरेट का इस्तेमाल कई पीढ़ियों से होता आया है। हालांकि समय के साथ इसका अर्थ बदलता रहा है। कभी यह किसी नकारात्मक किरदार की कमजोरी का संकेत बनी तो कभी अकेलेपन, तनाव और विद्रोह की पहचान।
खासकर एंटी-हीरो के किरदारों में सिगरेट का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी तरीके से किया गया। ऐसा किरदार जो सामाजिक नियमों की परवाह नहीं करता, अपनी शर्तों पर जिंदगी जीता है और व्यवस्था से टकराता है—उसके व्यक्तित्व को बिना संवाद के स्थापित करने में सिगरेट एक आसान दृश्य माध्यम बन गई।
‘एंग्री यंग मैन’ के दौर में बदला सिगरेट का अर्थ
सत्तर के दशक में हिंदी सिनेमा के नायक की छवि में बड़ा बदलाव आया। पर्दे पर ‘एंग्री यंग मैन’ का दौर आया। नायक अब केवल नेक और आदर्शवादी व्यक्ति नहीं था, बल्कि वह व्यवस्था से नाराज होता था, गुस्सा करता था और जरूरत पड़ने पर नियमों को चुनौती भी देता था।
अमिताभ बच्चन के कई लोकप्रिय किरदारों में सिगरेट, शराब और अकेलेपन जैसे तत्व उस दौर के पुरुष किरदार की बेचैनी और विद्रोही तेवर से जुड़े दिखाई दिए। ‘दीवार’ में विजय का किरदार इसका उल्लेखनीय उदाहरण माना जाता है।
सिनेमा ने सिगरेट को सामाजिक पहचान से जोड़ने का काम भी किया। बीड़ी, सिगरेट और सिगार को अलग-अलग वर्गों और व्यक्तित्वों के संकेत के तौर पर पर्दे पर इस्तेमाल किया गया।
जब सिगरेट बन गई दर्द और टूटन की भाषा
सिगरेट का अर्थ हमेशा ताकत या एटीट्यूड नहीं रहा। कई फिल्मों में यह किरदार के दर्द, अकेलेपन और आत्मविनाश की भावना को व्यक्त करने का माध्यम भी बनी।
‘देवदास’ इसका चर्चित उदाहरण है। शाहरुख खान द्वारा निभाए गए देवदास के किरदार में शराब और सिगरेट उसके भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष और टूटन को व्यक्त करने वाले दृश्य माध्यमों का हिस्सा हैं।
यानी एक ही सिगरेट अलग-अलग फिल्मों में अलग अर्थ पैदा कर सकती है। किसी प्रेम कहानी में यह रहस्य और आकर्षण का प्रतीक लग सकती है, किसी गैंगस्टर फिल्म में सत्ता और खतरे का संकेत बन सकती है और किसी त्रासद कहानी में दर्द तथा आत्मविनाश का।
सिगरेट और मर्दानगी का सिनेमाई रिश्ता
हिंदी फिल्मों ने लंबे समय तक पुरुष किरदार की मजबूत छवि बनाने के लिए कुछ खास दृश्य प्रतीकों का सहारा लिया। भारी आवाज, तेज गाड़ी, हथियार, शराब का गिलास, सूट, सिगार और सिगरेट इसी दृश्य भाषा का हिस्सा रहे हैं।
इनमें सिगरेट सबसे आसानी से इस्तेमाल किया जाने वाला प्रतीक बन गई। कैमरा जब किसी अभिनेता के चेहरे के क्लोजअप के साथ सिगरेट और धुएं को दिखाता है तो किरदार को संवाद बोले बिना ही ‘रफ’, ‘रहस्यमय’ या ‘बागी’ दिखाया जा सकता है।
पोस्टर में सिगरेट का असर और ज्यादा क्यों दिखता है?
फिल्म के किसी दृश्य और फिल्म के पोस्टर में बड़ा अंतर होता है। फिल्म में किसी किरदार का धूम्रपान कहानी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पोस्टर में अभिनेता की मुद्रा, कपड़े, चेहरे के भाव, रोशनी और हाथ में मौजूद वस्तु—हर चीज सोच-समझकर चुनी जाती है।
पोस्टर को एक ही तस्वीर में दर्शक के सामने किरदार का मूड और व्यक्तित्व स्थापित करना होता है। ऐसे में सिगरेट एक आसान दृश्य संकेत बन जाती है।
सूट पहने अभिनेता के हाथ में सिगरेट उसे रहस्यमय दिखा सकती है। वहीं किसी हिंसक या नकारात्मक किरदार के हाथ में यही सिगरेट उसके खतरनाक व्यक्तित्व को और उभार सकती है।
‘एनिमल’ से ‘लव एंड वॉर’ तक जारी दृश्य भाषा
‘एनिमल’ में रणबीर कपूर के रणविजय के किरदार की पूरी छवि आक्रामकता, सत्ता और मर्दानगी के इर्द-गिर्द दिखाई गई। ऐसे में सिगरेट केवल धूम्रपान की आदत नहीं, बल्कि किरदार की दृश्य प्रस्तुति का हिस्सा बन गई।
इसी तरह ‘धुरंधर’ में रणवीर सिंह के सिगरेट वाले लुक ने भी इसी तरह की दृश्य भाषा का इस्तेमाल किया। अब ‘लव एंड वॉर’ के पोस्टर में विक्की कौशल का सिगरेट वाला अंदाज सामने आने के बाद यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या बॉलीवुड में सिगरेट को एक बार फिर ‘कूल’ और ‘एटीट्यूड’ वाले व्यक्तित्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
कहानी की जरूरत और ग्लैमराइजेशन में अंतर
सिनेमा में किसी किरदार को धूम्रपान करते दिखाना और उसी धूम्रपान को आकर्षक अंदाज में पेश करना दो अलग बातें हैं।
कई बार सिगरेट किरदार की कमजोरी, तनाव या उसके व्यक्तित्व के अंधेरे पक्ष को दिखाने के लिए इस्तेमाल होती है। लेकिन जब उसी दृश्य के साथ अभिनेता का आकर्षक चेहरा, प्रभावशाली बॉडी लैंग्वेज, स्टाइलिश कपड़े, रोशनी और संगीत जुड़ जाता है, तो धूम्रपान की छवि आकर्षण पैदा करने लगती है।
यहीं से सिगरेट के सिनेमाई इस्तेमाल को लेकर बहस शुरू होती है।
बदलते दौर के साथ बदलता रहा सिगरेट का अर्थ
बॉलीवुड में सिगरेट का कोई एक स्थायी अर्थ नहीं रहा। अलग-अलग दौर में यह अलग-अलग भावनाओं की पहचान बनी।
कभी यह विलेन की पहचान रही, कभी ‘एंग्री यंग मैन’ की बेचैनी, कभी देवदास के दर्द का प्रतीक और कभी गैंगस्टर की सत्ता का संकेत। आधुनिक सिनेमा में यह कई बार एंटी-हीरो के एटीट्यूड और रहस्यमय व्यक्तित्व की पैकेजिंग का हिस्सा दिखाई देती है।
यही वजह है कि ‘लव एंड वॉर’ के पोस्टर के बाद शुरू हुई बहस केवल एक पोस्टर में सिगरेट दिखाने तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक सिनेमाई भाषा पर सवाल उठाती है, जिसमें दशकों से धूम्रपान को कभी दर्द, कभी विद्रोह और कभी आकर्षक व्यक्तित्व के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता रहा है।
स्रोत: मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर तैयार समाचार।
नोट: धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। समाचार में सिगरेट के सिनेमाई चित्रण और उसके सांस्कृतिक प्रभाव की चर्चा की गई है, इसका उद्देश्य धूम्रपान को बढ़ावा देना नहीं है।यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।