नियुक्ति अधिकारी के बराबर पद वाला अधिकारी कर्मचारी को हटा सकता है, अनुच्छेद 311 की रोक लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट
आरपीएसएफ के रक्षक की सेवा समाप्ति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटा, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया—हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति अधिकारी से निचले पद का होना जरूरी
NTN REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की सेवा समाप्ति से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 311(1) के महत्वपूर्ण पहलू पर फैसला सुनाते हुए कहा है कि इस प्रावधान की संवैधानिक सुरक्षा तभी लागू होती है, जब कर्मचारी को हटाने वाला अधिकारी उस अधिकारी से पदानुक्रम में नीचे हो, जिसने कर्मचारी की नियुक्ति की थी। यदि सेवा से हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति करने वाले अधिकारी के बराबर पद का है और संबंधित नियम उसे हटाने की शक्ति प्रदान करते हैं, तो केवल इस आधार पर अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने Union of India & Ors. v. Ramdhani Prasad मामले में यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा प्रथम अपीलीय अदालत के उन फैसलों को निरस्त कर दिया, जिनमें रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स (आरपीएसएफ) के एक रक्षक की सेवा से हटाने की कार्रवाई को असंवैधानिक माना गया था।
क्या है अनुच्छेद 311(1)?
संविधान का अनुच्छेद 311 सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्तगी, सेवा से हटाने अथवा पदावनति के मामलों में संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसके तहत किसी सिविल सेवक को ऐसे अधिकारी द्वारा बर्खास्त या सेवा से हटाया नहीं जा सकता, जो उसकी नियुक्ति करने वाले अधिकारी से पद में नीचे हो।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान मामले में इसी प्रावधान की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यह रोक तभी प्रभावी होगी, जब सेवा से हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति करने वाले अधिकारी से अधीनस्थ पद पर हो।
1979 में शुरू हुआ था मामला
मामला रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स के एक कर्मचारी से संबंधित है। मई 1979 में आरपीएसएफ गोरखपुर के कमांडेंट की ओर से संबंधित व्यक्ति को ‘रक्षक’ पद के लिए प्रारंभिक प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए बुलावा पत्र जारी किया गया था।
इस पत्र में नियुक्ति को प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने की शर्त से जोड़ा गया था। कर्मचारी ने प्रशिक्षण पूरा किया। इसके बाद दिसंबर 1979 में असिस्टेंट कमांडेंट की ओर से बटालियन आदेश जारी किया गया, जिसमें संबंधित व्यक्ति सहित अन्य प्रशिक्षुओं को ‘रक्षक’ के पद पर नियुक्त किए जाने और संबंधित बटालियनों में पदस्थ किए जाने का उल्लेख था। फरवरी 1980 में एक अन्य बटालियन आदेश के माध्यम से दिसंबर 1979 की नियुक्ति की पुष्टि की गई।
72 दिन तक स्वीकृत अवकाश से अधिक अनुपस्थित रहा कर्मचारी
मामले के अनुसार कर्मचारी स्वीकृत अवकाश की अवधि समाप्त होने के बाद 72 दिनों तक अतिरिक्त अनुपस्थित रहा। इस पर रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स नियम, 1959 के नियम 44 के तहत उसे आरोपपत्र जारी किया गया।
इसके बाद विभागीय जांच हुई। कर्मचारी के उपस्थित नहीं होने के कारण जांच एकतरफा आगे बढ़ी और मार्च 1983 में एडजुटेंट ने उसे सेवा से हटाने का आदेश जारी कर दिया। विभागीय अपील भी वर्ष 1984 में खारिज कर दी गई।
कर्मचारी ने उठाया अनुच्छेद 311 का मुद्दा
सेवा से हटाए जाने के बाद कर्मचारी ने सिविल मुकदमा दायर कर कार्रवाई को चुनौती दी। उसका मुख्य तर्क था कि वर्ष 1979 में जारी कॉल लेटर के माध्यम से उसकी नियुक्ति कमांडेंट/चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर ने की थी।
कर्मचारी का कहना था कि चूंकि एडजुटेंट नियुक्ति करने वाले अधिकारी से अधीनस्थ पद पर था, इसलिए उसके द्वारा सेवा से हटाने का आदेश संविधान के अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन है।
ट्रायल कोर्ट ने कर्मचारी का मुकदमा खारिज कर दिया था। हालांकि प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सेवा से हटाने की कार्रवाई को असंवैधानिक माना। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी वर्ष 2023 में दूसरी अपील में इस फैसले को बरकरार रखा था। इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कॉल लेटर और नियुक्ति आदेश में किया अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों दस्तावेजों का परीक्षण करते हुए कहा कि मई 1979 का कॉल लेटर बिना शर्त नियुक्ति का आदेश नहीं था। उसमें नियुक्ति को प्रारंभिक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने की शर्त से जोड़ा गया था।
इसके विपरीत दिसंबर 1979 के बटालियन आदेश में प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद कर्मचारियों को रक्षक के पद पर नियुक्त करने का स्पष्ट उल्लेख था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बटालियन आदेश को केवल पदस्थापना आदेश मानना सही नहीं है। कोई आदेश एक साथ नियुक्ति आदेश और पदस्थापना आदेश, दोनों की भूमिका निभा सकता है।
असिस्टेंट कमांडेंट को थी नियुक्ति और हटाने की शक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स अधिनियम, 1957 की धाराओं 6 और 9 तथा रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स नियम, 1959 के नियम 20 और 43 एवं संबंधित अनुसूचियों का परीक्षण किया।
कोर्ट ने पाया कि आरपीएफ में नियुक्तियों पर चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर का समग्र नियंत्रण होने के बावजूद संबंधित वैधानिक प्रावधान अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी नियुक्ति संबंधी शक्तियां प्रदान करते हैं।
नियमों के अनुसार असिस्टेंट सिक्योरिटी ऑफिसर/असिस्टेंट कमांडेंट को रक्षकों तथा वरिष्ठ रक्षकों की नियुक्ति और सेवा से हटाने की शक्ति प्रदान की गई थी।
नियुक्ति की शक्ति सौंपे जाने से अधिकारी का पदानुक्रम नहीं बदलता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय Krishna Kumar v. Divisional Assistant Electrical Engineer के सिद्धांत का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी को नियमों के तहत नियुक्ति या अनुशासनात्मक शक्ति सौंपे जाने मात्र से उसके पद का मूल पदानुक्रम नहीं बदलता।
वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि कर्मचारी की वास्तविक नियुक्ति असिस्टेंट कमांडेंट द्वारा जारी बटालियन आदेश के माध्यम से हुई थी। दूसरी ओर, जिस एडजुटेंट ने कर्मचारी को सेवा से हटाया, वह असिस्टेंट कमांडेंट से पदानुक्रम में अधीनस्थ नहीं था और संबंधित नियमों के तहत उसे सेवा से हटाने की शक्ति भी प्राप्त थी।
अनुच्छेद 311(1) की संवैधानिक रोक लागू नहीं हुई
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अनुच्छेद 311(1) के तहत संवैधानिक रोक तभी लागू होती है, जब बर्खास्तगी या सेवा से हटाने का आदेश ऐसे अधिकारी द्वारा जारी किया गया हो जो नियुक्ति करने वाले अधिकारी से पद में नीचे हो।
चूंकि वर्तमान मामले में यह आवश्यक शर्त मौजूद नहीं थी, इसलिए कर्मचारी की सेवा समाप्ति पर अनुच्छेद 311(1) की रोक लागू नहीं हुई।
एकतरफा विभागीय जांच पर भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
कर्मचारी ने विभागीय जांच को इस आधार पर भी चुनौती दी थी कि जांच उसकी अनुपस्थिति में एकतरफा आगे बढ़ाई गई और इससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि कर्मचारी को आरोपपत्र की जानकारी थी, उसने अपना जवाब भी प्रस्तुत किया था और उसे विभागीय जांच की तारीख के बारे में भी जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद वह जांच में उपस्थित नहीं हुआ।
इसके बाद जांच एकतरफा आगे बढ़ी और सेवा से हटाने से पहले कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि विभागीय जांच कर्मचारी की अनुपस्थिति में आगे बढ़ी, जांच को स्वतः प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले निरस्त
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रथम अपीलीय अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1979 के कॉल लेटर को नियुक्ति आदेश मानने में गलती की।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों को निरस्त करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बहाल कर दिया, जिसमें कर्मचारी का मुकदमा खारिज किया गया था।
इसका परिणाम यह हुआ कि कर्मचारी को सेवा से हटाने का आदेश भी बहाल हो गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य निष्कर्ष
इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि अनुच्छेद 311(1) के तहत किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा समाप्ति की वैधता तय करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि सेवा से हटाने वाला अधिकारी कौन है। यह भी निर्धारित करना आवश्यक है कि कर्मचारी की वास्तविक नियुक्ति किस अधिकारी ने की थी और सेवा से हटाने वाला अधिकारी उस नियुक्ति अधिकारी की तुलना में पदानुक्रम में कहां स्थित है।
यदि नियुक्ति नियमों के तहत किसी अधिकारी को सौंपी गई है और सेवा से हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति अधिकारी से अधीनस्थ नहीं है तथा उसे लागू नियमों के तहत सेवा समाप्त करने की शक्ति प्राप्त है, तो केवल अनुच्छेद 311(1) के आधार पर कार्रवाई को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।